कैसे भावनात्मक कारणों से खाना बंद करें: कार्ययोग्य तकनीकें
याद रखें: हर बार जब आप भावनाओं एवं भोजन के बीच में समय निकालते हैं, तो आप पहले ही बदलाव के रास्ते पर होते हैं。
प्रियजनों के साथ झगड़ा हुआ — तो एक चॉकलेट खा ली। काम पर थक गई — तो पिज्जा मंगवाया। शाम को बोर हुई — तो फ्रिज का सारा सामान खा लिया। भावनात्मक कारणों से अतिरिक्त खाना खाना वजन को नियंत्रित करने की कोशिशों को बर्बाद कर देता है, एवं भोजन से जुड़े संबंधों को भी नुकसान पहुँचाता है। हम यह जानेंगे कि क्यों हम अपनी भावनाओं को भोजन के माध्यम से दबाते हैं, एवं भावनाओं का सामना बिना भोजन की मदद के कैसे कर सकते हैं।
लेख के मुख्य बिंदु:
- भावनात्मक भूख एवं शारीरिक भूख में कई अंतर होते हैं;
- प्रतिबंध एवं निषेध “सुखद” भोजन की इच्छा को और अधिक तेज़ कर देते हैं;
- कार्य-तकनीकों को सीखने में समय लगता है, एवं इनसे तुरंत परिणाम नहीं मिलते;
- �ावनाओं को संभालने हेतु खाना खाना एक अभ्यास है, जिसे बदला जा सकता है;
- कभी-कभी समस्या गहरी होती है, एवं तब मनोचिकित्सक की मदद आवश्यक हो जाती है。
“शारीरिक भूख” एवं “भावनात्मक भूख” में क्या अंतर है?
दोनों प्रकार की भूखों में अंतर समझना, समस्या को हल करने की दिशा में पहला कदम है。
शारीरिक भूख:
- धीरे-धीरे विकसित होती है;
- आखिरी भोजन के कई घंटों बाद महसूस होती है;
- कोई भी भोजन इसे संतुष्ट कर सकता है;
- खाने के बाद संतुष्टि महसूस होती है;
- �ससे कोई अपराध-भावना नहीं उत्पन्न होती।
भावनात्मक भूख:
- अचानक एवं तेज़ी से महसूस होती है;
- पिछले भोजन के समय से इसका कोई संबंध नहीं होता;
- �िशेष प्रकार का भोजन ही इसे संतुष्ट करता है (अक्सर मीठा या चर्बीयुक्त);
- खाने के बाद भी असंतुष्टि महसूस होती है;
- �सके साथ अपराध-भावना एवं शर्मिंदगी भी होती है।
जब आप इन दोनों प्रकार की भूखों में अंतर समझ लें, तो आधी समस्या ही हल हो जाएगी。
Photo from freepik.comहम अपनी भावनाओं को क्यों भोजन के माध्यम से दबाते हैं?
भोजन एवं भावनाओं का संबंध बचपन में ही विकसित हो जाता है। जब बच्चा रोता है, तो उसे कुछ मिठाई दी जाती है; पढ़कर अच्छा नंबर आया, तो आइसक्रीम खरीदी जाती है; गिरकर चोट लगी, तो कुकीज़ दी जाती हैं। इस प्रकार, “नकारात्मक भावना = भोजन = आराम” का संबंध बन जाता है, एवं यही प्रक्रिया वयस्कता में भी जारी रहती है।
इसके अलावा, शरीर-विज्ञान के अनुसार, मीठा एवं चर्बीयुक्त भोजन डोपामाइन एवं सेरोटोनिन हार्मोनों के उत्पादन को बढ़ाता है; इससे मस्तिष्क को तुरंत आनंद मिलता है, एवं यह प्रक्रिया “प्रभावी” महसूस होती है।
लेकिन समस्या यह है कि यह प्रभाव केवल अस्थायी होता है; 20 मिनट बाद ही भावनाएँ फिर से उभर आती हैं, लेकिन इस बार अपराध-भावना एवं निराशा भी जुड़ जाती है।
**तकनीक #1: आवेग एवं क्रिया के बीच रुकावट लाएँ।** जब भोजन करने की इच्छा हो, लेकिन ऐसा भूख के कारण नहीं, बल्कि भावनाओं के कारण हो, तो एक पल के लिए रुक जाएँ। **“10-मिनट का नियम”:** खुद से कहें, “मैं 10 मिनट में इसे खा सकती हूँ।” एक टाइमर सेट करें, एवं उन 10 मिनटों में कुछ और करें — जैसे बालकनी में जाएँ, संगीत सुनें, किसी दोस्त से बात करें। 70% मामलों में, 10 मिनट बाद यह आवेग खत्म हो जाएगा; अगर नहीं, तो धीरे-धीरे एवं बिना किसी अपराध-भावना के खाएँ। यह तकनीक काम करती है, क्योंकि यह “भावना → भोजन” के स्वचालित संबंध को टूटा देती है, एवं विकल्प चुनने का मौका देती है।
**तकनीक #2: “भावनाओं एवं भोजन” संबंधी डायरी लिखें।** एक नोटबुक में निम्नलिखित जानकारी दर्ज करें: - समय; - क्या खाया गया; - उससे पहले कैसा महसूस हो रहा था; - उसके बाद कैसा महसूस हो रहा है। एक-दो सप्ताह बाद, पैटर्न स्पष्ट हो जाएंगे। क्या आप काम की तनावपूर्ण स्थिति में अतिरिक्त खाते हैं? सोने से पहले चिंता होती है? शाम को बोर हो जाते हैं? जब आप अपने “ट्रिगर” (कारण) पहचान लें, तो उनसे निपटना आसान हो जाएगा। उदाहरण के लिए, अगर हर शाम 9 बजे बोरी से फ्रिज में झुक जाते हैं, तो उस समय कुछ और करने की योजना बनाएँ।
**तकनीक #3: वैकल्पिक रणनीतियाँ बनाएँ।** अपनी भावनाओं से निपटने हेतु 10-15 क्रियाएँ तय करें, जिनमें भोजन का उपयोग न हो। **उदाहरण:** - तनाव में होने पर 10 स्क्वाट या पुश-अप करें; - सांस लेने की व्यायाम आदि करें; > अपना पसंदीदा गाना सुनें एवं उसके साथ गाएँ; - किसी दोस्त से बात करें।
**उदासी में होने पर:** - नहाएँ; - कोई मज़ेदार वीडियो देखें; > अपने कुत्ते/बिल्ली से खेलें; - डायरी में लिखें।
**बोरी में होने पर:** > टहलने जाएँ; > कोई शौक अपनाएँ; > किताब पढ़ें; > स्ट्रेचिंग करें।
महत्वपूर्ण बात यह है कि ये रणनीतियाँ वास्तविक एवं उपयोगी होनी चाहिए; अगर आपको कोई भी रणनीति पसंद नहीं आती, तो दूसरी चुनें।
**तकनीक #4: “जागरूकता के साथ खाएँ।”** अगर फिर भी आप खाना खाने का फैसला करें, तो उसे जागरूकता के साथ ही करें। **जागरूकता-भरा खाना:** - मेज पर बैठकर ही खाएँ; - भोजन को प्लेट में निकालकर ही खाएँ; - धीरे-धीरे एवं अच्छी तरह चबाकर ही खाएँ; - स्वाद, बनावट एवं गंध पर ध्यान दें; > बार-बार खुद से पूछें: “क्या मुझे अभी भूख लगी है?”
अक्सर पता चलता है कि केवल तीन-चार बार खाने से ही पर्याप्त हो जाता है; पूरी चॉकलेट खाने की आवश्यकता नहीं होती।
**तकनीक #5: “प्रतिबंधित” भोजन को स्वीकार करें।** अगर कोई खाद्य पदार्थ आपके लिए “प्रतिबंधित” है, तो भी उसे संयम से एवं जागरूकता के साथ ही खाएँ।
**तकनीक #6: “ट्रिगर परिस्थितियों” से निपटें।** जब कोई विशेष परिस्थिति आपको अतिरिक्त खाने पर मजबूर करे, तो निम्नलिखित उपाय करें: - दूसरे कमरे में चले जाएँ; - 10 गहरी सांसें लें; > अपनी भावनाओं को डायरी में लिखें; > 20 मिनट बाद ही फैसला करें कि क्या खाएँ।
पहली बार तो यह प्रक्रिया मुश्किल लग सकती है, लेकिन बार-बार करने से आपको इसकी आदत पड़ जाएगी।
**तकनीक #7: “आत्म-करुणा” का अभ्यास करें।** अगर आपने गलती से अतिरिक्त खाना खा लिया, तो खुद को दोष न दें। अपराध-भावना एवं शर्मिंदगी केवल समस्याओं को बढ़ाती हैं। बजाय इसके, “मैंने गलती की है, लेकिन मैंने पूरी कोशिश की” ऐसा सोचें। आत्म-करुणा, कमज़ोरी का कारण नहीं, बल्कि व्यवहार में बदलाव लाने हेतु एक उपाय है।
**कब पेशेवर मदद लें?** अगर भावनात्मक रूप से अतिरिक्त खाना आपकी जिंदगी को गंभीर रूप से प्रभावित करने लगे, तो मनोचिकित्सक से सलाह लें। **पेशेवर मदद लेने के संकेत:** - बार-बार अतिरिक्त खाना खाना; - उल्टी कराना या दस्त लेने हेतु दवाइयाँ लेना; - वजन में अत्यधिक उतार-चढ़ाव; > भोजन के बारे में हमेशा सोचना; - सामाजिक कार्यक्रमों से दूर रहना; > अवसाद, चिंता या कम आत्म-सम्मान।
भोजन संबंधी विकार, इच्छाशक्ति की कमी के कारण नहीं होते; ये मनोवैज्ञानिक समस्याएँ हैं, जिनका समाधान पेशेवर की मदद से ही संभव है。
**सामान्य गलतियाँ:** - **गलती #1: कड़ी डाइट।** कड़े प्रतिबंध भावनात्मक अतिरिक्त खाने को और बढ़ा देते हैं। - **गलती #2: घर से सभी स्वादिष्ट चीज़ें हटा देना।** समस्या तो भोजन में नहीं, बल्कि आपकी भावनाओं में है। - **गलती #3: तुरंत परिणाम की अपेक्षा करना।** आदतों में बदलाव लाने में समय लगता है। - **गलती #4: सभी भावनाओं को नियंत्रित करने की कोशिश करना।** कभी-कभी भोजन ही भावनाओं को संभालने का एकमात्र तरीका नहीं होता।
**क्यों कुछ तकनीकें काम नहीं करती हैं?** अगर कई सप्ताहों तक कोशिश करने के बाद भी कोई परिणाम न मिले, तो संभवतः निम्नलिखित कारण हो सकते हैं: - **नींद की कमी।** थकान की अवस्था में मस्तिष्क तुरंत ऊर्जा की माँग करता है; इसलिए भोजन खाया जाता है। - **वास्तविक कैलोरी-कमी।** अगर लंबे समय से कड़ी डाइट चल रही हो, तो भूख ही अतिरिक्त खाने का कारण हो सकती है। - **मनोवैज्ञानिक दुर्घटनाएँ।** अगर अतिरिक्त खाना कोई पुरानी मनोवैज्ञानिक समस्या के कारण हो रहा हो, तो मनोचिकित्सक की मदद आवश्यक है। - **हार्मोनल असंतुलन।** थायरॉइड या इंसुलिन से संबंधित समस्याएँ भी अतिरिक्त खाने का कारण हो सकती हैं।
**वास्तविक अपेक्षाएँ:** एक महीने तक इन तकनीकों का अभ्यास करने के बाद: - अतिरिक्त खाने की घटनाएँ कम हो जाएँगी; - प्रति बार खाया जाने वाला भोजन की मात्रा कम हो जाएगी; > अपराध-भावनाएँ कम हो जाएँगी; > आपको अपनी भावनाओं को पहचानने में सक्षमता मिल जाएगी। तीन महीने बाद: - भावनात्मक रूप से अतिरिक्त खाना, आपके लिए एक समस्या ही नहीं रह जाएगा; - आपके पास इसके वैकल्पिक तरीके हो जाएँगे; > भोजन से जुड़े आपके संबंध शांत हो जाएँगे।
हर कोई भावनात्मक रूप से अतिरिक्त खाने की आदत को पूरी तरह से छोड़ नहीं सकता; लेकिन इसे नियंत्रित करना संभव है।
**मुख्य नियम:** भोजन, शरीर के लिए ऊर्जा है, एवं आनंद देने वाला साधन भी है; लेकिन यह कोई “मनोचिकित्सक” नहीं है। चॉकलेट से काम की समस्याएँ हल नहीं होंगी, आइसक्रीम से रिश्ते ठीक नहीं होंगे, एवं पिज्जा अकेलापन को दूर नहीं कर सकती। भावनाओं से सीधे निपटना ही सही उपाय है; इसके लिए जागरूकता, समय एवं प्रयास आवश्यक हैं। लेकिन यह प्रक्रिया कठिन तो है, लेकिन निश्चित रूप से प्रभावी है। और याद रखें: हर बार जब आप अपनी भावनाओं एवं भोजन के बीच रुकावट लाएँ, तो आप पहले ही बदलाव की दिशा में आगे बढ़ रहे होंगे। चाहे अंत में आपने फिर भी खाना ही खा लिया हो, लेकिन कम से कम अब आप “स्वचालित रूप से” ऐसा नहीं कर रहे हैं… यही एक बड़ी प्रगति है।
कवर-फोटो: freepik.com
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