मुख्य घरेलू उपकरण: पिछले 100 वर्षों में वाशिंग मशीन का विकास कैसे हुआ
आज हम यही करते हैं: कपड़े डाल देते हैं, डिटर्जेंट मिला देते हैं, सही बटन दबा देते हैं… और अपना काम जारी रखते हैं। पहले तो इस मशीन को मैन्युअल रूप से चलाना एवं उसकी देखभाल करना पड़ता था… और कपड़ों को ध्यान से रखना भी पड़ता था, क्योंकि वे स्पिन चक्र में फंस सकते थे! हम आपको बताते हैं कि यह परिचित इलेक्ट्रिक मशीन एक सदी से भी अधिक समय में कैसे विकसित हुई है。
**1900 के दशक** पहली आधुनिक वाशिंग मशीनें अमेरिका में आईं। ये साधारण मशीनें लकड़ी के टबों में बनी हुई थीं… इनमें गोलाकार ड्रम होते थे, जिनमें कपड़े डालकर मैन्युअल रूप से घुमाया जाता था… अतिरिक्त पानी मैन्युअल रोलरों की मदद से निकाला जाता था… कपड़ों को भी मैन्युअल रूप से ही उन रोलरों से गुजारा जाता था। ऐसी मशीनों का उपयोग करके पूरे घर के कपड़े धोने में बहुत मेहनत लगती थी… इसलिए घरेलू महिलाएँ जब संभव होता तो सार्वजनिक लॉन्ड्रीमैटों का ही उपयोग करती थीं।
**1910 के दशक** 1908 में शिकागो के इंजीनियर अल्वा फिशर ने पहली बिजली-चालित वाशिंग मशीन बनाई। दो साल बाद हर्ले मशीन कंपनी ने इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू कर दिया। इस मशीन में लकड़ी का ड्रम होता था… जो हर दिशा में आठ बार घुमता था… अब इसे मैन्युअल रूप से घुमाने की आवश्यकता ही नहीं थी… बस वाशिंग मशीन के नीचे दिए गए हैंडल को खींच लेना पर्याप्त था। हालाँकि, मशीन के अंदर के सभी भाग खुले हुए ही रहते थे… इसलिए यह बहुत शोर करती थी… साथ ही, मैन्युअल रोलरों से अक्सर उंगलियाँ चोट लेती थीं… कभी-कभी कपड़ों में लगे बाल भी इन रोलरों में फंस जाते थे… एक बार तो ऐसा हुआ कि एक लड़की को चोट लग गई… लेकिन सौभाग्य से उसे सिर पर ही खरोंच आई। तथापि, अल्वा फिशर का यह आविष्कार इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना है… क्योंकि इससे घरेलू महिलाओं को कपड़े धोने में बहुत सुविधा हुई… पहले तो यह कार्य बहुत ही मेहनतभर एवं समय लेने वाला कार्य था।
**1920 के दशक**
अब अमेरिका में वाशिंग मशीनों का उत्पादन करने वाली कंपनियों की संख्या हजार से अधिक हो चुकी थी… नई-नई मशीनें बाजार में आ रही थीं। “थॉर” नामक मशीन के लॉन्च होने के दस साल भीतर ही अमेरिकी घरों में लॉन्ड्रीमैटों की संख्या काफी कम हो गई… समाजशास्त्रियों के अनुसार, अब लोग पुनः घर में ही कपड़े धोने लगे।

**1923 का वर्ष… अमेरिका में एक उपकरण दुकान… तस्वीर में बीच में वाशिंग मशीन है**
अब वाशिंग मशीनों का डिज़ाइन और भी उन्नत हो गया… पहले तो लकड़ी के टबों के बजाय एनामेल-लेपित स्टील के टब इस्तेमाल में आने लगे… हालाँकि, सुरक्षा का पूरा ध्यान नहीं दिया गया… मशीन के अंदर के भाग अभी भी खुले ही रहते थे। पहली बार “व्हर्लपूल” नामक कंपनी ने मशीनों के अंदर के भागों को प्लास्टिक के कवर से ढक दिया… साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया गया कि स्पिन रोलर केवल एक ही दिशा में घूमें… ताकि कोई चोट न हो।
**1930 के दशक** अब वाशिंग मशीनें सस्ती हो गईं… एवं यूरोप में भी इनकी बिक्री शुरू हो गई… अब इनमें ड्रेन पंप, इलेक्ट्रिक मोटरें एवं मैकेनिकल टाइमर भी शामिल हो गए… अब घरेलू महिलाएँ स्वयं ही वाशिंग का चक्र निर्धारित कर सकती थीं… पहले तो ऐसी सुविधाएँ मौजूद ही नहीं थीं। पहले ड्रायर भी आए… लेकिन वे अभी भी बहुत महंगे थे। महामंदी के कारण अमेरिका में ऐसी मशीनों की माँग कम हो गई… इसलिए लोग पुनः सार्वजनिक लॉन्ड्रीमैटों का ही उपयोग करने लगे। 1937 में पहला “स्व-सेवा वाला लॉन्ड्रीमैट” खुला… जहाँ वाशिंग से लेकर सूखाने तक का पूरा प्रक्रिया व्यक्ति ही संभालता था。
**1940 के दशक** 1940 के अंत में दो अमेरिकी कंपनियाँ – “बेंडिक्स कॉर्पोरेशन” एवं “जनरल इलेक्ट्रिक” – ने एकदम स्वचालित वाशिंग मशीनें लॉन्च कीं… ऐसी मशीनें एक ही चक्र में कपड़े धोती, धोकर पानी निकाल देती थीं। अब मनुष्य को कोई मेहनत ही नहीं करनी पड़ती थी… मशीन स्वयं ही सभी कार्य कर लेती थी… प्रोग्राम चुनकर वाशिंग का चक्र निर्धारित किया जा सकता था… धोने की बार-बारी, स्पिन चक्र आदि भी समायोजित किए जा सकते थे। कपड़ों के प्रकार के हिसाब से विशेष वाशिंग प्रोग्राम भी उपलब्ध होने लगे… ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था。
**2000 के दशक एवं आज** अब सभी चरणों में वाशिंग प्रक्रिया स्वचालित हो गई है… अब हर प्रकार के कपड़ों को धीरे-धीरे एवं सही तरीके से धोया जाता है… दाग भी आसानी से हट जाते हैं… प्रमुख उपकरण निर्माता कंपनियाँ इन कार्यों हेतु नए तरीके विकसित करती जा रही हैं। आधुनिक वाशिंग मशीनों का एक महत्वपूर्ण पहलू ऊर्जा-कुशलता भी है… बड़ी कंपनियाँ अपने उपकरणों में ऐसे समाधान लागू कर रही हैं, जिससे ऊर्जा-खपत कम हो… इससे बिजली की बचत होती है… एवं पर्यावरण पर भी कम नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। “स्मार्ट होम सिस्टम” भी लोकप्रिय होते जा रहे हैं… इसलिए कई कंपनियाँ ऐसी मशीनें बना रही हैं, जिनमें वाई-फाई कनेक्शन हो… ताकि लोग स्मार्टफोन के माध्यम से दूर से ही अपने कपड़े धो सकें… चाहे वे घर पर ही न हों। आने वाले 20–30 वर्षों में वाशिंग मशीनें कैसी दिखाई देंगी… यह कहना मुश्किल है… लेकिन “मैन्युअल धोने” की प्रक्रिया शायद अब सिर्फ कपड़ों को हल्के तरीके से धोने हेतु ही उपयोग में आएगी… क्या यह अच्छी बात नहीं है?!
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