क्यों सोवियत घरों में कम धूल हुआ करती थी?
आइए जानते हैं कि पिछले कुछ दशकों में हमारे घरों में क्या बदलाव आए, और ऐसा क्यों हुआ कि आधुनिक अपार्टमेंट धूल इकट्ठा करने वाली जगहें बन गए हैं。
अपनी दादी से पूछिए कि वे युवावस्था में हफ्ते में कितनी बार धूल साफ करती थीं… आपको एक आश्चर्यजनक उत्तर मिलेगा: हफ्ते में एक बार, या इससे भी कम। आजकल धूल लगभग एक-दो दिनों में ही जमा हो जाती है… इसलिए सफाई एक अनंत कार्य बन गई है। ऐसा नहीं है कि पहले लोग कम स्वच्छ रहते थे, या उन्हें धूल का अहसास ही नहीं होता था… सोवियत घरों में वाकई कम धूल होती थी… इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी हैं… आइए जानें कि पिछले कुछ दशकों में हमारे घरों में क्या बदलाव आए, और आधुनिक अपार्टमेंट क्यों धूल इकट्ठा करने लगे हैं。
लेख के मुख्य बिंदु:
- सोवियत घरों में ऐसी सामग्रियों से ही निर्माण किया जाता था जिनसे कम धूल उत्पन्न होती थी;
- केंद्रीय हीटिंग प्रणाली स्थिर रूप से काम करती थी, और हवा को सूखा नहीं करती थी;
- �र्नीचर एवं कपड़े प्राकृतिक सामग्रियों से बनाए जाते थे… इनसे रुका हुआ विद्युत उत्पन्न नहीं होता था;
- धूल उत्पन्न करने वाली वस्तुएँ कम ही होती थीं… जैसे घरेलू उपकरण, कृत्रिम कपड़े, प्लास्टिक;
- अपार्टमेंटों की व्यवस्था ऐसी होती थी कि हवा आसानी से घूम पाती थी。
**निर्माण सामग्री: गुणवत्ता, न कि तेज़ी…** सोवियत घरों में ऐसी ही सामग्रियों का उपयोग किया जाता था जो दशकों तक टिकती रहती थीं… सिरेमिक ईंट, सीमेंट प्लास्टर, मजबूत लकड़ी से बने फर्श… इनसे बहुत कम ही धूल उत्पन्न होती थी। आधुनिक निर्माण सामग्रियाँ, जैसे प्लास्टिक कंक्रीट, जिप्सम बोर्ड, लैमिनेट… हल्की एवं सस्ती होती हैं… लेकिन इनसे लगातार छोटे कण उत्पन्न होते रहते हैं。
**आधुनिक समापन सामग्रियाँ… विशेष रूप से धूल उत्पन्न करने वाली…** कागज़ी वॉलपेपर, सजावटी प्लास्टर, PVC छत… ये सभी धूल के स्रोत हैं। सोवियत काल में दीवारों पर तेल का रंग या कागज़ी वॉलपेपर लगाया जाता था… इनसे कोई धूल नहीं उत्पन्न होती थी।
**सीमेंट भी अलग था…** सोवियत सीमेंट में अधिक चूना होता था, एवं कम रासायनिक पदार्थ… इसलिए यह मजबूत होता था, एवं समय के साथ टूटता नहीं था। आधुनिक सीमेंट में प्लास्टिकरिकारक एवं तेज़ करने वाले पदार्थ होते हैं… इसलिए यह कमज़ोर होता है, एवं जल्दी ही धूल उत्पन्न करने लगता है。
**हीटिंग: स्थिरता बनाम किफायत…** सोवियत देशों में केंद्रीय हीटिंग प्रणाली “अधिक गर्मी, बेहतर” के सिद्धांत पर काम करती थी… रेडिएटर पूरे मौसम भर समान रूप से गर्मी पहुँचाते थे… इसलिए तापमान 20–22° सेल्सियस पर ही बना रहता था… आर्द्रता भी 40–50% होती थी…
**आधुनिक हीटिंग प्रणालियाँ… कम खर्चीली, लेकिन कम स्थिर…** व्यक्तिगत बॉयलर थर्मोस्टेट के अनुसार चालते हैं… इसलिए तापमान में उतार-चढ़ाव होता है… नए अपार्टमेंटों में रेडिएटर कम शक्ति वाले होते हैं… इसलिए हीटिंग प्रणाली कम कुशल होती है।
**निम्न आर्द्रता में… धूल जल्दी ही हवा में मिल जाती है…** आधुनिक अपार्टमेंटों में शीतकालीन आर्द्रता 15–25% होती है… इसलिए धूल जल्दी ही हवा में मिल जाती है, एवं लंबे समय तक हवा में ही रहती है… आदर्श आर्द्रता 45–50% होनी चाहिए… तब धूल के कण भारी हो जाते हैं, जल्दी ही नीचे गिर जाते हैं… एवं गीले कपड़े से आसानी से हटा जा सकते हैं。
**लकड़ी के फर्नीचर बनाम पार्टिकल बोर्ड/एमडीएफ…** सोवियत फर्नीचर ज्यादातर प्राकृतिक लकड़ी से बनाए जाते थे… ओक, बर्च, पाइन… ऐसी लकड़ी में कोई रुका हुआ विद्युत उत्पन्न नहीं होता… सतहें चमकदार होती थीं, एवं इन्हें साफ करना आसान होता था।
**आधुनिक फर्नीचर… धूल उत्पन्न करने वाले…** पार्टिकल बोर्ड, मीडियम-डेंसिटी फाइबरबोर्ड, एमडीएफ से बने फर्नीचर… लगातार छोटे कण उत्पन्न करते हैं… इनकी सतहें विद्युत आकर्षित करती हैं… इसलिए धूल जल्दी ही इन पर जमा हो जाती है।
**फर्नीचर के अस्तर… भी बदल गए हैं…** पहले सोफे मखमली, ऊनी कपड़ों से ढके होते थे… ऐसी सामग्रियाँ धूल नहीं आकर्षित करती थीं… आजकल सोफे कपड़ों से बनते हैं… ऐसी सामग्रियाँ धूल को आकर्षित करती हैं।
**डिज़ाइन: पावेल फोतेएव…**
**कपड़े: प्राकृतिक रेशे बनाम कृत्रिम…** सोवियत अपार्टमेंटों में कपास, लिनन से बनी चादरें, ऊनी कालीनें होती थीं… प्राकृतिक सामग्रियाँ धूल नहीं आकर्षित करती थीं।
**आधुनिक घरों में कृत्रिम सामग्रियाँ…** पॉलिएस्टर की चादरें, एक्रिलिक कालीनें… ऐसी सामग्रियाँ हवा में धूल जमा करती हैं।
**घरेलू उपकरण…** सोवियत अपार्टमेंटों में घरेलू उपकरण कम ही होते थे… एवं सरल होते थे… इनसे कम ही धूल उत्पन्न होती थी।
**आधुनिक घरों में बहुत सारे उपकरण हैं…** प्रत्येक उपकरण धूल उत्पन्न करने का स्रोत है।
**कॉस्मेटिक एवं घरेलू रसायन…** पहले कम ही कॉस्मेटिक एवं रसायनिक उत्पाद उपलब्ध थे… आजकल इनकी मात्रा अधिक है… इनसे भी धूल उत्पन्न होती है।
**व्यवस्था एवं वेंटिलेशन…** सोवियत अपार्टमेंटों में ऐसी ही व्यवस्था की जाती थी कि हवा आसानी से घूम पाए… खिड़कियाँ ऐसी होती थीं कि हवा बाहर निकल जाए… चौड़ी खिड़की की नीचे की सतहें भी हवा के प्रवाह में मदद करती थीं।
**सोवियत अपार्टमेंटों की छतें…** 2.7–3.2 मीटर ऊँची होती थीं… इसलिए हवा आसानी से घूम पाती थी… धूल ऊपर उठकर फैल जाती थी, एवं साँस लेने के स्तर पर ही नहीं रुकती थी।
**आधुनिक अपार्टमेंटों में वेंटिलेशन…** नए अपार्टमेंटों में वेंटिलेशन डक्ट बहुत ही संकीर्ण होते हैं… इसलिए हवा ठीक से घूम नहीं पाती।
**धूल की संरचना…** सोवियत अपार्टमेंटों में धूल ज्यादातर प्राकृतिक ही होती थी… त्वचा के टुकड़े, बाल, पौधों के परागकण… ये सभी धूल के स्रोत हैं… आधुनिक धूल में कई कृत्रिम तत्व भी होते हैं… जैसे प्लास्टिक, रासायनिक पदार्थ… इनसे धूल अधिक उत्पन्न होती है।
**वैक्यूम…** वैक्यूम का उपयोग कम ही किया जाता था… इसलिए फर्श गीले कपड़ों से ही साफ किए जाते थे… गीली सफाई, वैक्यूम की तुलना में अधिक प्रभावी होती है… क्योंकि वैक्यूम के फिल्टर धूल को सही तरह से नहीं रोक पाते।
**कालीनें…** सोवियत काल में कालीनें बाहर ही हिलाई जाती थीं… इससे सारी धूल निकल जाती थी… आजकल ऐसा कम ही किया जाता है… इसलिए कालीनें धूल से भर जाती हैं।
**पर्यावरणीय परिस्थितियाँ…** सोवियत काल में शहरों में कम ही कारें होती थीं… इसलिए धुआँ एवं प्रदूषण कम होता था… आजकल शहरों में बहुत सारी कारें हैं… इसलिए धूल भी अधिक हो गई है।
**आज क्या बदला जा सकता है…** 1. **हाइड्रेटर का उपयोग करके आर्द्रता 45–50% पर रखें।** 2. **प्राकृतिक सामग्रियों से बने फर्नीचर एवं कपड़े चुनें।** 3. **कमरों को अक्सर ही वेंटिलेट करें।** 4. **कृत्रिम सतहों पर एंटी-स्टैटिक उत्पाद लगाएँ।** 5. **एयर कंडीशनर एवं प्युरिफायर में फिल्टरों को नियमित रूप से बदलें।** 6. **गीले कपड़ों से ही अक्सर सफाई करें।**
**मुख्य बात यह है…** आजकल अपार्टमेंटों में धूल इसलिए ही अधिक है, क्योंकि हम सुविधा एवं विविधता की ओर अधिक झुक गए हैं… धूल को पूरी तरह से खत्म करना संभव नहीं है… लेकिन इसकी मात्रा को कम किया जा सकता है, यदि हम इसके कारणों को समझ लें।
**कवर: पावेल फोतेएव द्वारा डिज़ाइन किया गया…**
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