हार्मोन एवं पोषण: हम जो खाते हैं, वह हमारी मूड एवं कल्याण को कैसे प्रभावित करता है?

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भोजन के चयन का हमारी मूड, भावनात्मक स्थिति एवं समग्र कल्याण पर क्या प्रभाव पड़ता है?

क्या आपने कभी सोचा है कि एक पूर्ण भोजन के बाद आपको नींद आने लगती है, जबकि थोड़ी चॉकलेट आपका मूड बेहतर बना देती है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि भोजन एवं हमारा कल्याण का संबंध हमारे अनुमान से कहीं अधिक गहरा है। आइए जानें कि हम जो खाते हैं, वह हमारे हार्मोन एवं भावनाओं पर कैसा प्रभाव डालता है。

**सेरोटोनिन: क्यों पास्ता हमें खुश करता है?**

क्या आपको भी पास्ता खाने के बाद शांति महसूस होती है? ऐसा संयोग से नहीं होता। कार्बोहाइड्रेट, ‘खुशी का हार्मोन’ सेरोटोनिन के उत्पादन को बढ़ावा देते हैं। इसी कारण हम दुखी होने पर मीठे या आटा-आधारित भोजन चाहते हैं।

लेकिन अपनी फ्रिज में कुकीज़ भरने से पहले सावधान रहें। जटिल कार्बोहाइड्रेट, जैसे साबुत अनाज की रोटी, अनाज एवं सब्जियाँ ही उचित विकल्प हैं; क्योंकि ये रक्त शर्करा में अचानक वृद्धि के बिना ही मूड को स्थिर रखते हैं。

**तनाव एवं कोर्टिसोल: क्यों हम गलत आहार की ओर आकर्षित हो जाते हैं?**

तनावपूर्ण समय में शरीर कोर्टिसोल हार्मोन उत्पन्न करता है, जिससे भूख बढ़ जाती है, विशेषकर चर्बीयुक्त एवं मीठे भोजन की इच्छा। इसी कारण कठिन दिन के बाद हमें पिज्जा या चिप्स खाने की इच्छा होती है।

तनाव से निपटने के लिए पैदल चलना, मेडिटेशन या गर्म स्नान जैसे तरीके अपनाएँ; क्योंकि ये हमारी भावनाओं पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं, बिना हमारे शरीर को नुकसान पहुँचाए।

**डोपामाइन: क्यों फास्ट फूड छोड़ना मुश्किल है?**

चर्बीयुक्त एवं नमकीन भोजन डोपामाइन हार्मोन के उत्पादन को बढ़ावा देते हैं, जिससे हमें खुशी महसूस होती है। इसी कारण फास्ट फूड हम पर गहरा प्रभाव डालता है। दिमाग, ऐसे अनुभवों को याद रखता है एवं उनकी पुनरावृत्ति चाहता है।

इस दुष्चक्र से बचने के लिए धीरे-धीरे फास्ट फूड का सेवन कम करें। फ्रेंच फ्राइज़ की जगह बेक्ड स्वीट पोटैटो लें, एवं बर्गर की जगह टर्की सैंडविच खाएँ। समय के साथ ही अस्वस्थ भोजन की इच्छा कम हो जाएगी।

**मेलाटोनिन: क्यों टर्की हमें नींद आने का कारण बनता है?**

थैंक्सगिविंग पर खाए गए टर्की में ट्रिप्टोफैन प्रचुर मात्रा में होता है, जो मेलाटोनिन हार्मोन का स्रोत है। इसी कारण छुट्टियों पर खाने के बाद हमें नींद आने लगती है।

लेकिन सभी नींद के कारणों को टर्की पर नहीं डाल सकते। खाने के बाद नींद आना एक सामान्य शारीरिक प्रतिक्रिया है; क्योंकि पाचन के लिए रक्त पेट में जाता है, जिससे दिमाग में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है।

**इंसुलिन: रक्त शर्करा में उतार-चढ़ाव एवं मूड पर उसका प्रभाव**

रक्त शर्करा में अचानक वृद्धि हमारे मूड को प्रभावित कर सकती है। मीठा खाने के बाद ग्लूकोज़ का स्तर तेज़ी से बढ़ जाता है, जिससे इंसुलिन उत्पन्न होता है। यह अस्थायी रूप से ऊर्जा एवं खुशी प्रदान करता है, लेकिन फिर रक्त शर्करा में गिरावट आ जाती है, जिससे हम थके एवं चिड़चिड़े महसूस करने लगते हैं。

ऐसी स्थिति से बचने के लिए नियमित रूप से एवं छोटे-छोटे हिस्सों में भोजन करें। कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन एवं फाइबर का संतुलित सेवन करें; ताकि रक्त शर्करा में उतार-चढ़ाव न हो।

**लेप्टिन एवं ग्रेलिन: हमारी भूख को नियंत्रित करने वाले हार्मोन**

लेप्टिन, हमें भूख लगने का संकेत देता है, जबकि ग्रेलिन भूख को कम करता है। इन हार्मोनों में असंतुलन होने से अतिरिक्त भोजन लेने एवं वजन बढ़ने की समस्या हो सकती है।

इन हार्मोनों को संतुलित रखने के लिए पर्याप्त नींद आवश्यक है। अध्ययनों से पता चला है कि नींद की कमी से लेप्टिन का स्तर कम हो जाता है, जबकि ग्रेलिन का स्तर बढ़ जाता है। इसी कारण नींद न होने पर हमें भूख अधिक लगती है।

**कैफीन: मित्र या शत्रु?**

कई लोगों के लिए सुबह की कप कॉफी दिन की शुरुआत है। कैफीन, एडेनोसिन रिसेप्टरों को ब्लॉक करके ऊर्जा प्रदान करता है; लेकिन अत्यधिक कैफीन से चिंता एवं अनिद्रा हो सकती है। इसलिए दोपहर 2 बजे के बाद कॉफी पीने से बचें, एवं प्रतिदिन केवल 2-3 कप ही पीएँ。

**ओमेगा-3: मस्तिष्क के कार्यों में सहायक फैटी एसिड**मछली, नट्स एवं बीजों में प्रचुर मात्रा में ओमेगा-3 फैटी एसिड पाया जाता है, जो मस्तिष्क के कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह न्यूरॉनों को सही ढंग से कार्य करने में मदद करता है, जिससे मूड एवं संज्ञानात्मक क्षमताओं में सुधार होता है।

अध्ययनों से पता चला है कि जो लोग नियमित रूप से ओमेगा-3 युक्त भोजन खाते हैं, उनमें अवसाद की समस्या कम होती है। इसलिए अपने आहार में अधिक सैल्मन, सार्डिन, अखरोट एवं अलसी का तेल शामिल करें。

**प्रोबायोटिक्स: हमारे माइक्रोबायोटा एवं हमारी भावनाएँ**

हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों ने आंतों एवं मस्तिष्क के बीच अद्भुत संबंध पाया है। हमारी आंतों में रहने वाले बैक्टीरिया हमारे मूड एवं व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।

आंतों में रहने वाले बैक्टीरिया न्यूरोट्रांसमीटर उत्पन्न करते हैं, जैसे सेरोटोनिन एवं डोपामाइन। इसलिए एक स्वस्थ माइक्रोबायोटा हमारी पाचन प्रणाली के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी आवश्यक है।

लाभकारी बैक्टीरिया को बनाए रखने के लिए अपने आहार में दही, केफिर, सॉसरक्राउट एवं अन्य किण्वित खाद्य पदार्थ शामिल करें。

**विटामिन डी: अवसाद से बचने में मददगार विटामिन**

विटामिन डी की कमी अक्सर मौसमी अवसाद से जुड़ी होती है। यह विटामिन सेरोटोनिन के उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, एवं हमारे मूड को संतुलित रखने में मदद करता है।

सर्दियों में, जब सूर्य की रोशनी कम होती है, तो विटामिन डी की कमी से अवसाद हो सकता है। इसलिए मछली, अंडे एवं मशरूम जैसे खाद्य पदार्थ आहार में शामिल करें। धुंधले दिनों में विटामिन डी की गोलियाँ भी ली जा सकती हैं, लेकिन पहले डॉक्टर से सलाह अवश्य लें。

**“खुशी” भरा मेनू कैसे तैयार करें?**

अब जब हम जान गए हैं कि भोजन हमारे हार्मोनों एवं मूड पर कैसा प्रभाव डालता है, तो आइए ऐसा मेनू तैयार करें जिससे हमारा स्वास्थ्य बेहतर रहे:

  • **नाश्ता:** ओटमील, नट्स एवं बेरी (जटिल कार्बोहाइड्रेट + ओमेगा-3);
  • **नाश्ता:** दही, केला (प्रोबायोटिक्स + सेरोटोनिन);
  • **दोपहर का भोजन:** सैल्मन एवं एवोकाडो वाली सलाद (ओमेगा-3 + स्वस्थ वसा);
  • **दोपहर का नाश्ता:** बादाम एवं डार्क चॉकलेट (प्रोटीन + एंटीऑक्सीडेंट);
  • **रात का भोजन:** टर्की, बेक्ड स्वीट पोटैटो एवं ब्रोकली (ट्रिप्टोफैन + विटामिन)。

याद रखें, “खुशी” पाने का कोई एक ही तरीका नहीं है। अपने शरीर की आवश्यकताओं को ध्यान में रखके ही भोजन चुनें।

हमारा भोजन केवल ऊर्जा प्रदान करने वाला सामान नहीं है; बल्कि यह हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण तत्व है। इसलिए अगली बार जब आप कुछ खाने का फैसला करें, तो केवल कैलोरी ही नहीं, बल्कि उस भोजन के हमारी भावनाओं एवं हार्मोनों पर पड़ने वाले प्रभाव पर भी ध्यान दें।